शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

किसी को जब याद कर कसक सी उठे,अपने पास होने का अहसास जगे,
हवाएँ रूह की जुबा जब बन जाए,हल्के से उसे सहला महक जाए।
ना रहे किसी बन्धन में,ना रिश्ते की मोहताज़।
बस रूह से रूह की पहचान,
जिन्दा होने का भान।

शमा खान

सोमवार, 27 जून 2016

मोह को सीमा में बाँध ले रे मन
कतरन कतरन तुझे ये बिखरा ना दे,
अपने ही रंग को धुला न दे,
रंगहीन,बेरंग न बन
मोह को सिमा में बाँध ले रे मन।
भीतर तक जज्बा किया अब तक जो तूने,
खींच कर सत् तेरा ख़ाली न कर दे तुझे
सूख  कर अपनी कुमुदनी को,
जलने ना दे मन।
जोत जला कर रख उसकी बस
मिल जाना है आखिर में जिसकी
हर इक पल को ऐसे जी ले,
सीख रहा हो गुर जैसे जलने के
आँधी में, बिन तेल के
रोशन होने को
जहां में बिखरने को
बस अब तो
 बांध ले रे मन

कुछ तो बात है जिंदगी के हुसूलों में
टूट कर चाहें तो अश्क देती है
बेपरवाह बने तो सीने से लगा लेती है।


रविवार, 22 मई 2011

ilmashama: keveta

ilmashama: keveta: "तन्हा होने पर ये जीवन का दर्शन समझ मे आता है . मै क्या हूँ , वो क्या है फ़लसफ़ा समझ मै आता है . जब रिश्तो म़..."

keveta


तन्हा होने पर ये जीवन का दर्शन समझ  मे  आता है .
 मै क्या  हूँ , वो क्या है  फ़लसफ़ा  समझ  मै आता  है .
                   जब  रिश्तो  म़े बढ़ जाती  है  दूरिया,
                   हर ओर  छा जाती  है  ख्मोशिया
                    जब हर  पल  मन हो जाता  है  बैचन,
                      बार बार  लहेरो  से जूझ  कर भी ,
              किनारे  खड़ा  पाता है मन .
                                            ये  आदमी  की  फितरत  है  शायद
                                          टूटते  रहने पर भी  नित  नये रिश्ते  बनाता है
                                           धोखा  खा , हाथ  झाड़कर  खड़े  हो जाता  है
                        एक  ओर  रिश्ता बनाने को ,आगे कदम बढाता है .
  क्या  खोया है ,क्या  पाया है  का  समीकरन  मन  बैठाता है ,
कहा लूटा  है ,कंहा लुटा, सोच  मन पछताता  है .
कण -कण म़े ,हर  धड़कन  मे, फिर  भी तलाशता  रहता  है मन
माँ  के  आंचल  मे ,दोस्त  की  अठखली मे ,बेटी  के अपनेपन  मे ,
प्रेमी के सपनों मे ,जीवन का हर पल जीता है .  


jiven dershen

तन्हा होने पर ये जीवन का दर्शन समझ  मे  आता है .
 मै क्या  हूँ , वो क्या है  फ़लसफ़ा  समझ  मै आता  है .
                   जब  रिश्तो  म़े बढ़ जाती  है  दूरिया,
                   हर ओर  छा जाती  है  ख्मोशिया
                    जब हर  पल  मन हो जाता  है  बैचन,
                      बार बार  लहेरो  से जूझ  कर भी ,
              किनारे  खड़ा  पाता है मन .
                                            ये  आदमी  की  फितरत  है  शायद
                                          टूटते  रहने पर भी  नित  नये रिश्ते  बनाता है
                                           धोखा  खा , हाथ  झाड़कर  खड़े  हो जाता  है
                        एक  ओर  रिश्ता बनाने को ,आगे कदम बढाता है .
  क्या  खोया है ,क्या  पाया है  का  समीकरन  मन  बैठाता है ,
कहा लूटा  है ,कंहा लुटा, सोच  मन पछताता  है .
कण -कण म़े ,हर  धड़कन  मे, फिर  भी तलाशता  रहता  है मन
माँ  के  आंचल  मे ,दोस्त  की  अठखली मे ,बेटी  के अपनेपन  मे ,
प्रेमी के सपनों मे ,जीवन का हर पल जीता है .